मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता। गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

बहुत  नहीं सिर्फ  चार कौवे थे काले ,उन्होंने ये तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें ,रुकें ,खाएं और गायें ,वे जिसको  त्यौहार कहें सब उसे मनायें  .

कभी -कभी जादू हो जाता  दुनिया में ,दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया  में ,

ये औगुनिये चार बड़े सरताज हो गये  ,इनके नौकर चील गरुण और बाज़ हो गए।

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में ,हाथ बाँध कर खड़े हो गए सब विनती में ,

हुक्म हुआ चातक पंछी रट  नहीं लगाएं ,पिऊ -पिऊ को छोड़ कांव -कांव ही गाएँ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को ,खाना पीना मौज़ उड़ाना छुटभैयों को ,

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में ,बड़े बड़े मनसूबे आये उनके जी में।

उड़ने तक के नियम बदल कर  ऐसे ढाले ,उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले।

आगे क्या हुआ सुनाना बहुत कठिन है ,यह दिन कवि  का नहीं चार कौओं का दिन है ,

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना ,लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह  सुनाना।

                          -----------------------  (भवानी प्रसाद मिश्र )

कविता -संग्रह ' जी हाँ मैं गीत बेचता हूँ किस्म -किस्म के गीत बेचता हूँ। ' से साभार।

                               ----------------------------------(भवानी प्रसाद मिश्र )
प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरु भाई )

भावसार :भवानी भाई की ये कविता आपातकाल में तब लिखी गई थी जब इस देश की तमाम संविधानिक व्यवस्थाओं  के ऊपर एक इंद्रा -जी  पालती मारकर  बैठ गईं थीं।महज़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय के फैसले को धता बताते हुए तब उन्होंने जो सन्देश दिया था भारत के जन-मन को उसका खुलासा यह कविता बेलाग होकर करती है। यह वह दौर था जब  तमाम छद्म मेधा उनकी हाँ में हाँ भयातुर होकर मिलाने लगी  थी। लेकिन उस दौर में भी दुष्यंत कुमार और भवानी दा जैसे लोग थे जिन्होंने अपनी अस्मिता को बचाके रखा था और ये कविता दागी थी उस समय की दुर्दशा से संतप्त होकर:

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की  मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता।
गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

ये वो लोग थे जो यह कहते समझते थे -जब हम पैदा हुए थे तभी से इस सृष्टि का निर्माण हुआ है । उस व्यववस्था के ध्वंश अवशेष आज भी अपने बेटे का नाम प्रभात रखके ये समझते हैं हमने सूरज को पाल लिया है। वह भी तभी निकलेगा जब हम चाहेंगे।

इसी इंद्रावी तंत्र के कुछ अवशेष और चंद कट्टर पंथियों की गोद  में पोषण पाते हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए आज मोदी को फूंटी आँख नहीं देख पा रहे हैं। जानते हैं किसलिए :

वह इसलिए अब सूरज नियमानुसार उदित हो रहा है किसी का पालतू नहीं है। 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं।

शिखर से शून्य तक की यात्रा 

मरणासन्न रावण लक्ष्मण  के प्रश्नों का उत्तर देते हुए  सीख देता है :

(१)इच्छाओं की पूर्ती से इच्छाओं का अंत नहीं होता ,इच्छाएं और बढ़ जाती हैं ,इच्छाओं का रूपांतरण करना पड़ता है मैं यहीं चूक गया। 

(२)शुभ काम के करने में कभी देरी नहीं करनी चाहिए और अशुभ के करने में जल्दी। 

(३ )अपने शत्रु की क्षमताओं को कभी भी अपने से कम आंक के नहीं देखना ये मेरी तीसरी भूल थी मैं इसी गुमान में रहा एक वनवासी वानर ,एक मनुष्य मेरा क्या मुकाबला करेगा। यह रावण की लक्ष्मण  को तीसरी सीख थी। 

(४ )कभी अपने जीवन की गुप्त बातों को किसी के सामने प्रकट न करना मैंने एक बार यह गलती की थी विभीषण को अपनी मृत्यु का राज बतला दिया था ,जिसका खामियाज़ा अब मैं भुगत रहा हूँ। 

'हम काहू के मरहि न मारे ,
वानर मनुज जाति दुइ मारे। '-यही वर माँगा था रावण ने शिवजी से ,ब्रह्मा जी से ,रावण तप और तपस्या दोनों के फलितार्थ का दुरूपयोग करता है। 
रावण नीति थी संस्कृति को नष्ट करना सरस्वती को हासिल करके। मेधा के दुरुपयोग  की शुरुआत ही रावण नीति थी।हमारे लेफ्टिए इसका साक्षात प्रमाण हैं।  

रावण ने  पहले तप करके अनेक वरदान अर्जित किये ,फिर उनका गलत प्रयोग करके शाप कमाए। 

जो खुद रोये और दूसरों को भी रुलाये वही रावण है। 'राव' से रावण। 

जो अपनी पुत्र -वधु को न  छोड़े उसका नाम रावण है। 

नल कुबेर का शाप था जिसकी वजह से  रावण ने  सीता के अपहरण  के बाद उनका स्पर्श नहीं किया।पर नारी का उसकी  सहमति के बिना उसका मस्तिष्क सौ टुकड़ा हो जाता।  
जो अपनी बहन को विधवा बना दे उसका नाम रावण है। 

महत्वकांक्षी रावण का कोई सम्बन्धी नहीं होता। बस एक महत्वकाँक्षा की आपूर्ति ही उसका लक्ष्य होता है। रिश्ते उसके लिए बोझ थे जिनका उसने बहुत दुरूपयोग किया।यहां तक की पार्वती को हासिल करने की उसने कुचेष्टा की।  
सेटिंग और दलाली ही रावण वृत्ति है रावण की सौगातें हैं। संतानें हैं। बलवान दिखे तो उससे माफ़ी मांग लो कमज़ोर दिखे तो उसे जीत लो। यही रावण वृत्ति थी।बाली उसे छ:  तक अपनी कांख में दबाये रहा। उससे माफ़ी मांग बाहर आकर डींग हांकने लगा।  
दो कुंठाएं भी थीं रावण की -कोई भी सुन्दर स्त्री उस पर मोहित नहीं होती थी। बस वह उठाकर ज़रूर ले आता था सौंदर्य को। दस सिर वाला काला-कलूटा रावण - सौंदर्य उसका क्या करे। 
रावण भीड़ का नेता था। भगवान्  समूह बनाते हैं। भीड़ के कोई सिद्धांत नहीं होते ,भीड़ का कोई चेहरा भी नहीं होता। राम समूह बनाते हैं वह भी स्थानीय तौर पर उपलब्ध मानव संशाधनों का। 

मानस की यह सीख है :प्रकृति और परमात्मा का कभी अपमान नहीं करना ,हम आज अशांत इसीलिए हैं भगवान् की जो प्रकृति अभिव्यक्ति है,भगवान् की जो शक्ल है  उसी प्रकृति  के साथ हम खिलावड़ कर रहें हैं। कहीं पेड़ काट रहें  हैं कहीं खदानों को डाइनेमाइट लगाकर उड़ाते हैं।

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। 

सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं। 
रावण शान्ति भंग करता है। 
राम संस्कृति की रक्षा के लिए आये थे एक सीता को रावण से मुक्त कराने के माध्यम से वह सारे संसार की  पीड़ित महिलाओं के अनुरक्षण के लिए आये थे -जब -जब भी किसी महिला का अपहरण होगा राम आयेंगे।
आज जहां -जहां वैष्णव तरीके से जीने वाले पति -पत्नी में तनाव है ,वहां उसकी वजहें आपसी समझ का अभाव है क्योंकि पढ़े लिखे लोगों के बीच में विमत का रहना लाज़िमी है और इसमें बुरा भी कुछ नहीं है ,अब परिवार चलेगा तो समझ से ही चलेगा। एक दूसरे की कमज़ोरियों के प्रति सहनशील होने से ही चलेगा। आज विवाह दो पॅकेजिज़ दो बैलेंसशीट्स के बीच गिरह गांठ है। विवाहेतर संबंध भी सामने आ रहे हैं दोनों के ,पति के भी पत्नी के भी। अरूप रावण दोनों में विद्यमान है। 

हालांकि घर में पैसा इफरात से है लेकिन सुख शान्ति नहीं है। समाधान क्या है ?

समाधान :अन्न का नियंत्रण अन्नपूर्णा को अपने हाथ में लेना पड़ेगा। खाना अपने हाथ का बनाके खिलाना पड़ेगा पति को। मन में प्रेम भाव रखते हुए पकाना पड़ेगा। इस अन्न से ही एक प्रेम संसिक्त मन बनेगा। 
रावण ने घरों के अन्न पर भी प्रहार किया है (प्रहार किया था )-खाना तो घर का बना खाइये भले आप के पास प्रतिमाह लाखों के पैकिज़िज़ हैं। 

हनुमान (भक्ति )यदि आपके हृदय में है तो आप अंदर के अरूप रावण से जीत जायेंगे,यकीन मानिये। 
जीवन प्रबंधन की दीक्षा है रामचरित मानस में ,हनुमान चालीसा में जिसका पाठ तीन से पांच मिनिट में संपन्न हो जाता है। हनुमान समस्याओं के समाधान के हनू -मान हैं। असंभव को सम्भव बनाते हैं हनुमान। हनुमान चालीसा के तीरों से मारा जाएगा अरूप रावण। 
जीवन एक नियम का नाम है परिवार के नियम ,समाज के नियम ,जो इन नियमों को तोड़ता है वह रावण तत्व का पोषण करता है। रावण अपनी योग्यता का दुरूपयोग करता है। मातृशक्ति का अपमान करता है। 
अच्छाई जहां कहीं भी हो स्वीकार कर लेना अपना लेना । बुराई अपनी जब भी दिखे स्वीकार कर लेना। हम रावण से अपने बचपन, जवानी और बुढ़ापे को बचाएं। 

ज्ञान की अति रावण को बर्बाद कर गई थी। आज नौनिहालों को इंटरनेट की अति से भी बचाने की जरूरत है। 

आज बच्चा पैदा होते ही उस नर्स को घूरने  लगता है जो कान से मोबाइल लगाए हुए है।  नर्स कहती है विस्मय से क्यों रे छुटके क्यों घूर रहा है मुझको।ज़वाब मिलता है ज़रा अपना मोबाइल दीजिए -भगवान्  को एसएमएस करना है मैं ठीक ठाक पहुँच गया।  
सन्दर्भ -सामिग्री :

https://www.youtube.com/watch?v=Js0B_JpEAgQ

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

इन दिनों ये हालात हैं मेरे भारत के :कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं।

इन दिनों ये हालात हैं मेरे भारत के  

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 

https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की :एक शहज़ादा अखिल भारतीय देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। पांच- पांच मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है।

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की 

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 

https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना , जहां कुमति तहाँ विपत निदाना .

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया डॉक्टर सतीश त्यागी जी 

आपने हमें  प्रस्तुत पोस्ट का कच्चा माल पकड़ा दिया।

बिलकुल सही निष्कर्ष निकाला है चेताया है इस मंदमति को -

"ये जीजू को मरवाएगा" 

इसमें एक कमज़ोरी अंग्रेजी भाषा की भी रही है -'जहां ब्रदर -इन -ला 'संज्ञा और सम्बोधन दोनों से ही यह पता नहीं

चलता कि जीजा कौन है और साला कौन है। इसलिए हिंदी भाषा ने -तमाम जीजाओं ने -बड़ी चालाकी से सालिग्राम

(साले साहिब अर्थात )

'आधे- मालिक' हमारे ये भी हैं कहकर तमाम सालों का परिचय करवाना कब का शुरू कर दिया था। ).हिंदी भाषा में कई

जगह ध्वनित अर्थ साले का गाली भी निकाला जाता है। खासकर जब हम किसी को चुनौती देते हुए देख लेने की धमक

देते हैं -कहते हुए साले तुझे तो देख लूंगा।

अब इस वंशीय राजकुमार के यहां तो परम्परा से संबंधों का मतलब जैविक -संबंध ही रहा है। इसीलिए एक मर्तबा इनकी

बहिना के लिए अपने एक सम्बोधन में  नरेंद्र मोदी ने  कहा -वह तो मेरी बेटी समान है ,बेटी ही है तो अगले दिन इनका

रिजॉइंडर चला आया -मेरे पिताजी तो राजीव गांधी थे मैं किसी की बेटी फेटी नहीं हूँ।

यहां ज़नाब सतीश त्यागी जी 

रागात्मक संबंधों के लिए गुंजाइश ही नहीं है। 

राहुल अपनी कुशाग्र -बुद्धि से जानते हैं 'साला' एक गाली है। इसीलिए हो सकता है वह अपने को वाड्रा का साला मानने

में  हीनता  अनुभव करते हों।

बहरसूरत सब जानते हैं कांग्रेस ने अमित शाह को गुजरात में कितना तंग किया था ,कैसे -कैसे आरोप पत्र मढ़े -गढ़े  थे। अमित शाह तो साफ़ बच गए क्योंकि उनके खिलाफ कुछ प्रमाणित न हो सका।

 लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी। 

अमित शाह के पुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने वाले भी अब बैकफुट पे आये दीख रहे हैं ,बचावी भूमिका में आ गए हैं "रेलवे मंत्री को उनका बचाव नहीं करना चाहिए था "कह रहें हैं।

हमारा मानना है ,जांच से जो सामने आये सो आये ,जांच चले खूब चले ,चिंता किसे है ,ये बात ये मंदमति समझ ले तो उचक -उचक बोलने से कमसे कम इस मामले में तो बाज़ आये। वरना इसका तो जो बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा जीजू ज़रूर मारा जाएगा।


आखिर में एक शैर इस मंद मति के नाम (भगवान् इन्हें सुमति प्रदान करे ):

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,

बिलकुल तेरे जैसी हो ,

मेरा चाहे जो भी हो,

 तेरी ऐसी -तैसी हो।  

तुलसीदास मानस में कहते हैं :

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना ,

जहां कुमति तहाँ विपत निदाना  . 

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है। समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है। जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है।

न प्रारेण नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन|  

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो | | (कठोपनिषद ,द्वितीय अध्याय दूसरी वल्ली ,पांचवां श्लोक)

भावसार :इस सृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र चेतन शक्ति है ,जो वनस्पति ,जीव -जंतु ,पशु -पक्षी व सभी मनुष्यों के जीवन का आधार और कारण है। इसी शक्ति से ये सभी जीवन पाते हैं ,वृद्धि करते हैं तथा क्रिया करते हैं।

दूसरा तत्व जड़ है जिसकी सभी क्रियाएं इस चेतन तत्व के कारण ही होतीं हैं। (प्रकृति स्वयं जड़ है ,ब्रह्म की ही एक शक्ति -'माया शक्ति' है जिसका ब्रह्म से संयोग होने पर ही यह प्रकृति बनके प्रकटित होती है। ).

मनुष्य के जीवन का आधार भी यही आत्मतत्व है। प्राण एवं अपान  भी इसी के आश्रय में अपनी क्रिया करते हैं। दूसरा तत्व जड़ है जो हमारा पंचभौतिक शरीर है।

जब यह आत्मतत्व शरीर से अलग हो जाता है तो प्राण भी अपनी क्रिया बंद कर देता है जिससे मनुष्य मर जाता है। लेकिन इस क्रिया में न जड़ (शरीर )मरता है न चेतन  आत्मा। बल्कि दोनों का संबंध विच्छेद हो जाता है। (आत्मा तो अजर -अमर -अविनाशी चेतन तत्व कहा गया है और यह पांच तत्वों का पुतला ऊर्जा का पुंजमात्र विखंडित होकर अपने मूल तत्वों -आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी में विलीन हो जाता है। ऊर्जा का संरक्षण हो जाता है।

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत  है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है  यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है।

समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया  है।

जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है। 

https://www.youtube.com/watch?v=6dNAG38cveI 

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

भाजपा -नीत सरकार के सत्ता में आते ही इंतहापसन्द मुसलमान जो कांग्रेस राज में परितुष्ट रखे जाते थे जिनका हिन्दुस्तान की सम्पत्ति पर पहला हक़ जतलाया दोहराया  जाता था - जिस तरह मुंह खोलकर बोलता रहा है ,वामपंथी कहीं से
एक कन्हैयाँ पकड़ लाये ,उससे पहले रोहित वोमिला के दुखद अंत की वजह बने वह सिलसिला अभी रुका नहीं है।

परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,

हवा में सनसनी घोले हुए हैं।

वर्तमान कांग्रेस -वामपंथ पोषित  जेहादी सोच के लोगों का हिन्दुस्तान पर बढ़ता शिकंजा और पंजे की शै के  मद्दे नज़र हमें उल्लेखित पंक्तियाँ अनायास याद हो आईं गोधरा के फ़ांसीयाफ्ता मुजरिमों को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा  मिली राहत पर -

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे ,जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे।

भावसार : सारी  कुरीतियां मिट जाएँ ,खालसा पंथ जागे -सम्भल जाएँ सनातन धर्मी समाज को तिरछी निगाह से देखने  वाले। यही सन्देश था गुरुगोविंद सिंह का खालसा पंथ की नींव रखते वक्त।औरंगजेबी सोच को फतहनामा था ये पंक्तियाँ।
लेकिन कांग्रेस के इरादे आज़ादी के पहले से ही कुछ और चले आये हैं :

१९२५ में कांग्रेस ने खालसा पंथ को एक अलग  धर्म का दर्ज़ा देकर एक तरह से सनातन धर्म के व्यापक स्वरूप में तोड़ फोड़ की ,मानव कृत विखंडन की शुरुआत  थी ये साजिश थी ।इसी साजिश के तहत जैन -पंथ को सनातन धारा से अलग करवाया इसे भी एक अलग धर्म की मान्यता मिली।

ऐसी  लगातार विखंडन की   एक  परिणति गोधरा कांड भी  थी ,जिसके तहत जेहादियों ने यह सन्देश दिया था -जो अयोध्या और राम का नाम लेगा उसका यही हश्र होगा।

आज इस संदर्भ का जेहन में चले आना आकस्मिक नहीं है ,गुजरात हाई -कोर्ट का वह फैसला है जिसके तहत फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया गया है। क्या कुछ संविधानिक तकाज़े रहें हैं इस मामले में ऊंची कचहरी की इस फेरबदल पर हमें कुछ नहीं कहना है।
अलबत्ता जिस तरह से भारतीय प्रिंट और इलेक्त्रोनी मीडिया ने इस खबर को नज़रअंदाज़ किया है वह भारत धर्मी समाज को ज़रूर खबरदार करता है। चौंकाता है ,आगाह करता है ,पूछता है खुद को मुस्लिम फस्टर्स कहने वाले कट्टर पंथियों द्वारा रचित गोधरा के फांसी पाए मुज़रिमों को कोर्ट की राहत पर वह खामोश क्यों है ?यह वही मीडिया है जो उसी दौर में एक मुसलमान एमपी के आगकी लपटों  में घिर जाने का तप्सरा बरसों बरस सुनाता रहा ,कई महीनों क्या सालों यह ज़नाज़ा निकला।

पूछा जा सकता है -

"भारतीय युवा क्या तब जागेगा जब उसके नाम पर भी तलवार चलायी  जाएगी ,पूछा जाएगा उससे -तुम्हारा नाम 'नन्द लाल क्यों है 'अकबरादुद्दीन क्यों नहीं है।कुंजबिहारी क्यों हैं आज़म खाना क्यों नहीं है ? मुरारी लाल क्यों है मोहम्मद अली क्यों नहीं है ?

खुद को मुस्लिम पहले समझने बूझने मान ने वाले जेहादी सोच के लोग यही सोचते होंगें इस फैसले पर  -हमारा कोई क्या कर लेगा ,अधिक से अधिक आजीवन कारावास ,उससे क्या हमारा खूंटा उखड़ता है ?

"राम का नाम भी लोगे तो ऐसे ही जला दिए जाओगे।"तौबा करो अयोध्या से अब वरना ...हश्र जानते ही हो।  

भारत धर्मी समाज  को काटा जा रहा है ,गोधरा के जेहादियों का यही सन्देश जा रहा है , हम जो कुछ भी करें  ,हम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता इस देश में। कहाँ गए नेहरू के वंशज?जिन्होनें इस अलहदगी की नींव  रखी जिन्ना को सरआंखों पर बिठाया ?सब खामोश ही नहीं संतुष्ट हैं मय अपने  पाले हुए प्रवक्ताओं के।

हमारा इस पोस्ट के मार्फ़त सम्पूर्ण भारत -धर्मी- समाज से आवाहन है इस मामले को ,गुजरात उच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले के खिलाफ वह उच्चतम न्यायालय  जाए।

जाग जवानी भारत की  ,
कह  अलग कहानी भारत की।

संदर्भ -सामिग्री :यह विचार मानने डॉ नन्द लाल मेहता वागीश जी के हैं जो इस देश के न सिर्फ एक प्रखर विचारक हैं ,भारत धर्मी समाज के एक समर्पित सिपाही भी हैं। उनसे हुई फोन -वार्ता ही हैं ये उदगार जिसमें हमारी भूमिका श्रोता की थी। 

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

पानी पानी पानी पानी , बन के सुनामी त्रास है पानी , मृत्यु और अकाल है पानी , जलप्लावन का सार है पानी।

झरोखा सेहत का :एक सामान्य हेल्दी   व्यक्ति को प्रतिदिन

- कितना पानी पीना चाहिए ,और क्यों ?

(१ )क्या आप पर्याप्त पानी पी रहे हैं रोज़ाना ?

(२ )पानी का इंटेक ,आपके द्वारा दिन भर में पीया गया पानी -न सिर्फ आपको चार्ज्ड रखता है ,जलनियोजित  (Hydrated )रखता है,जल नियोजन के लिए जलमिश्रित बने रहने के लिए भी ऐसा ज़रूरी समझा गया है। नाज़ुक चीज़ है आपके शरीर का जल -नियोजन, जल -बजट.हाइड्रेटिड बने रहना। 

आपके द्वारा ग्रहण की गई कैलोरी का यह विनियमन भी करता है नियंत्रित भी करता है कैलोरी इंटेक को ,आपके बॉडी वेट (भार या वजन )को। भूख से प्यास का  कोई संबंध नहीं है ,भूख और चीज़ है प्यास और। 

(३ )राष्ट्रीय चिकित्सा अकादमी (अमरीकी )पुरुषों के लिए प्रतिदिन ३. ७ लीटर तथा महिलाओं के लिए २. ७ लीटर जल रोज़ाना पीने  की सिफारिश करती है। इसमें जलीय पेय भी शामिल हैं अन्य स्रोतों जलीय तरकारियों ,सलाद (ककड़ी ,खीरा ,मूली गाजर आदि -आदि) से चले आने वाला जल भी शामिल है। अल्कोहल इस वर्ग में नहीं आएगा जो बॉडी को डिहाइड्रेट(निर्जला ) करता है -एक बूँद नीट शराब जबान से १००० बूँद पानी खींच लेती है। 

(४ )जल आपके जोड़ों को स्नेहिल बनाये रहता है एक स्नेहक का काम करता है रुक्ष होने से बचाता है। लम्बी दौड़ हो या कोई भी ऑक्सीजन की अधिक खपत और मांग करने वाला व्यायाम या कसरत -जल आपके दमखम को बनाये रहता है। महज मिथ है कि पसीने में पानी नहीं पीना चाहिए। लम्बी दौड़ के धावक छोड़िये रोज़मर्रा की लम्बी सैर के दौरान भी बा -खबर लोग पानी की बोतल साथ रखते हैं। 

(५ ) आपके मिज़ाज़ को खुशनुमा सचेत एवं स्फूर्त ,तथा अल्पावधि याददाश्त को बनाये रखने में भी आप की  मदद करता है - पर्याप्त जल नियोजन।जल का अभाव होने पर आप  की एंग्जायटी (बे -चैनी )बढ़ जाती है। 

(६ ) लिटमस पेपर टेस्ट है आपके जल नियोजन को आंकने का -देखिये आपको प्यास कितनी लगती है आपके पेशाब का रंग कैसा है ?यदि आप  प्यासे नहीं हैं ,प्यास  का एहसास नहीं है और रंग हल्का -पीला तकरीबन -तकरीबन पारदर्शी है तो आपके शरीर का जलमान ,जलनियोजन ,हायड्रेशन लेवल ठीक है। 

(७ )आपके जलनियोजित होने रहने पर आपका दिल धमनियों में पर्याप्त खून सुगमता से भेजता है और ऐसे में आपकी पेशियाँ भी आसानी से पर्याप्त जलीकृत बनी रहतीं हैं ,स्नेहित बनी रहती हैं ।

 डीहाईड्रेटिड  रहने पर आप अपने दिल का काम बढ़ा लेते हैं। दिल को उतना ही रक्त उठाने धमनियों में उलीचने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती हैं। 
(८ )जल -मिश्रित (वेळ -हायड्रेटिड )रहने पर मूत्र मार्ग क्षेत्र के संक्रमण (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन )के खतरे कमतर रहते हैं। किडनी स्टोन बनने की संभावना डीहयड्रेटिड रहने पर इसलिए बढ़ जाती है ,आपके पेशाब में मौजूद खनिज लवण मणिभ (रवे या Crystals )बनाने लगते हैं। 

(९ )खीरा -मूली -गाजर ककड़ी ,सेलरी ,लेटस , कुरकुरा ताज़ा कच्चा ब्रोक्क्ली  आपके द्वारा ग्रहण जल की मात्रा में ही गिना जाता है। भोजन में इनका अपना महत्व है। तमाम ज़रूरी खनिज यहां से आपको मिलते हैं। 

(१० )जलनियोजित रहने पर आपका पाचन क्षेत्र बा -खूबी काम करता है। प्यासा जलहीना रह जाने,पानी की कमी हो जाने  पर आपका मल(बिष्टा या एक्स्क्रीटा  ) सूख जाता है कब्ज़ रहने लगती है। अक्सर हमारे बुजुर्ग ज़रुरत से बहुत कम जल पीते हैं। 

जलनियोजन से महरूम शरीर बिष्टा (मल )से जलीय अंश वापस खींच लेता है। 

(११ )हाइपो -नाट्रेमिअ या जलविषाक्तण (Hyponatremia or Water-Intoxication ):

हमारी किडनियां (गुर्दे )प्रतिघंटा सौ मिली -लीटर (आम भाषा में सौ ग्राम या एक ग्लास पानी  )  ही हेंडिल कर सकतीं हैं। अब ऐसे में कोई दसलिटर पानी एक साथ गटक ले ,बहुत कम समय में ही सही ,एक के बाद सांस ले लेकर दूसरा फिर तीसरा ग्लास पानी का .....  पी ले तो किडनियां ज़वाब दे जातीं हैं। इस पानी को ठिकाने लगाना उनकी सीमा से बाहर है।  यह मेडिकल कंडीशन है ,फ़ौरन ध्यान न देने पर व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। 


बचपन में एक खेल देखा था -सर्कस का एक कलाकार एक बड़ा जार पानी एक बार में ही पी जाता था ,लेकिन फ़ौरन उसे उगल भी देता था। पानी में कई मर्तबा छोटी -छोटी मच्छी भी रहतीं थीं जिन्हें वह लगातार निकाल -निकाल के दिखाता था। कौतुक दिखाने के चक्कर  में आप कभी भी ऐसा न करें। 

वाटरटोक्सीमिया के मामले में पानी की अतिरिक्त मौजूदगी हमारे शरीर में खनिजों का स्तर खतरनाक तरीके से गिरा देती है इसीलिए इस स्थिति को -हाइपो (यानी सामान्य से नीचे का स्तर )नाट्रेमिया कहा गया है। 
अन्य वजहें भी रहतीं हैं इस मेडिकल कंडीशन की :यथा -

देखें उल्लेखित सेतु :

(१ )https://www.google.com/search?q=what+is+hyponatremia+and+what+causes+it&rlz=1CAACAP_enUS646US647&oq=what+is+hyponatremia+&aqs=chrome.5.69i57j0l5.22117j0j1&sourceid=chrome&ie=UTF-8

(२ )Hyponatremia. Hyponatremia is decrease in serum sodium concentration < 136 mEq/L caused by an excess of water relative to solute. Common causes include diuretic use, diarrhea, heart failure, liver disease, renal disease, and the syndrome of inappropriate ADH secretion (SIADH).

(३ )https://www.webmd.com/fitness-exercise/features/water-intoxication#1

How much would you have to drink? An enormous amount. Gallons and gallons of water.
"These are very isolated cases, and this is extremely rare," says Sharon Bergquist, MD. She's an assistant professor of medicine at Emory University School of Medicine in Atlanta. "More people by far and away are dehydrated, [rather] than having a problem with over-hydration."




What Is Water Intoxication?


If you drink a bottle of water here and there when you exercise or when you're hot, you’ll be fine. Where you run into problems is drinking way too much too fast.

कुलमिलाकर लब्बोलुआब यही है :अति सर्वत्र वर्ज्यते ,बोले तो -

अति का भला न बोलना ,अति की भली न चूप (चुप्प ) ,
अति का भला न बरसना ,अति की भली न धूप। 
आपका शरीर एक खेत की तरह हैं इसे सींचिये लेकिन उतना ही जितना ज़रूरी है इसके सुचारु संचालन के लिए। कुछ मेडिकल कंडीशंस में यथा -प्रोस्टेटिक एंलार्जमेंट के मामलों में  एक साथ एक लीटर या और भी ज्यादा पानी  पीना वांछित नहीं है। गुर्दों का काम बढ़ जाता है। 
कुछ खास यौगिक और इतर किर्याओं को करने वाले लोग उष: पान करते हैं एक साथ एक डेढ़ लीटर पानी सुबह -सुबह बासी मुंह पी जाते हैं । यह सबके के लिए न तो सम्भव है न अक्लमंदी का काम है न  मुनासिब ही है । 
(१२ )पर्याप्त जलनियोजन बनाये रखने के और कई फायदे हैं ,सिरदर्द की अवधि और तीव्रता बर्दाश्त के अंदर रहती है। कमतर रहती है। दूसरे छोर पर मीग्रैन (आधा -शीशी का पूरा उग्र  सिरदर्द ) के मामलों  में जलनियोजन का अभाव ,पानी की कमी होने पर मीग्रैन का दौरा  भड़क सकता  है। 
जलनियोजन को बनाये रहने जल की कमी से बचे रहने के लिए अपने साथ हमेशा पानी की बोतल रखिये चाहे फिर वह सैर -सपाटा हो  या किसी भी अन्य किस्म की आउटिंग। रेस्त्रां में वेटर पहले पानी लाता है गटक लीजिये। 
अपनी  खुराक  में फल -सलाद आदि कोशिश कीजिए खुराक का ४० फीसद हिस्सा घेरे रहें। 
यह आकस्मिक नहीं है कहा गया है -जल ही जीवन है। हमारे शरीर का अधिक  भाग पानी ही है। वयस्कों में शरीर का औसतन ५७ -६० फीसद हिस्सा जल ही रहता है।
एक साला होने से पहले शिशुओं में जल की मात्रा ७५-७८ फीसद रहती है जो एक साला होने पर घटके औसतन ६५ फीसद रह जाती है। 
शरीर में मौजूद कुल पानी का दो तिहाई अंश इंट्रा -सेलुलर (कोशिकाओं के बीच में )तथा शेष एक तिहाई इनके बाहर रहता है। पानी हमारी कोशिकाओं का बुनियादी कच्चा माल है जिसका उपयोग कोशिकाओं की वृद्धि में सहायक होता है। 
हमारा कुदरती  तापनियामक- थर्मोस्टेट है जल।
जहां हमारे शरीर में प्रोटीनों और कार्बोहाइड्रेटों के  चय -अपचयन (मेटाबॉलिज़्म )में पानी की जरूरत रहती है वहीँ यह लार के लिए आवश्यक जिंस है जिसकी पाचन में महती भूमिका रहती है। 
हमारे शरीर से मलबा ,अवांछित कचरा ,गैर -ज़रूरी पदार्थ निकालने का एक तंत्र है पानी। गर्भ- जल ही हिफाज़त करता है गर्भस्थ की। जन्मजात  शोक अब्जॉर्बर है शरीर का जल। संभाल के रखता है हमारे दिल औ दिमाग अन्य महत्वपूर्ण अंगों को।  

देखें सेतु :
https://www.thoughtco.com/how-much-of-your-body-is-water-609406

विशेष :पानी को आब कहा गया है मुक्तावली  (दन्तावली ) का पानी(इनेमल )उतर जाये तो दांत बे -आब। सच्चे मोती का पानी उतर  जाये तो दो कौड़ी का। आदमी की आँखों का पानी उतर   जाये तो  बे -शर्म ,निर्लज्ज कहाये।पानी -पानी हो जाये।  

आब गई आदर गया नैनं गया स्नेह।  

मुहावरों लोकोक्तियों से बाहर निकलके देखिये तो पानी की समस्या दिनों दिन जटिल होती जा रही है यहां तक की पानी के बंटवारे को लेकर एक बड़ा युद्ध भी राष्ट्र -राज्यों के बीच छिड़ सकता है। गुज़रे ज़माने की फिल्म 'चम्पाकली' और 'दो बूँद पानी 'पानी की समस्या को बेहतरीन तरीके से उठाती हैं।   

हमारे शरीर में ही नहीं हमारे पर्यावरण में भी पानी का संरक्षण ज़रूरी है। पंचभूतों में से एक आवश्यक तत्व है पानी।इसीलिए कहा गया है 'बिन पानी सब सून ' . 

हमारी नदियों  का जल स्वादिष्ट और पीने योग्य था ,नदियाँ प्रदूषित हुईं जल गंदला ला  गया ,

'जल गया जीवन गया'। नदियों के जल का संरक्षण बे -हद ज़रूरी है।

https://www.youtube.com/watch?v=m8cuLrSIWD8 

जगत की नश्वरता का रूपक भी प्रस्तुत करता है  पानी :

जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ,

जग रचना तैसे रची कहु नानक सुन मीत। (गुरुग्रंथ साहब नौवां महला श्लोक संख्या २५ )

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात,

देखत ही बुझ जायेगा ,ज्यों तारा परभात।

इसलिए जीवन का उपहार ही नहीं मृत्यु और संहार भी पानी है :

पानी पानी पानी पानी ,

बन के सुनामी त्रास है पानी ,

मृत्यु और अकाल है पानी ,

जलप्लावन का सार है पानी। 

नेक माया के स्वरूप को भी समझाता है पानी :

कबीर कहते हैं :

पानी में मीन प्यासी रे ,

मोहे सुन -सुन आवत हांसी रे। 

भावसार :परमात्मा का आत्मा से विछोह हैं यहां यद्यपि परमात्मा सब जगह है लेकिन माया शक्ति (अपनी इलूज़री एनर्जी ,भौतिक या मटीरिआल ऊर्जा से आवृत्त परमात्मा से जीव का विछोह बना ही रहता है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है। यह जगत भी एक प्रतीति मात्र है ,जल में रहते हुए भी मछली अपने जीवन के आधार ब्रह्म को बूझ नहीं पाती।
जलथल सागर हूर रहा है भटकत फिरी  उदासी रे 

ये जीवन समुन्दर की मानिंद ही है जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। हमारा मन उस परमात्मा की खोज में भटकता ही रहता है। 
आत्मज्ञान बिना नर भटके ,कोई मथुरा कोई काशी रे। 

"स्व ''  अपने निज आत्म स्वरूप का ज्ञान न होने की वजह से ही हम बाहर उस सुख की खोज करते फिर रहें हैं उस आनंद को ढूंढ रहें हैं जो हम ही हैं। हमारा रीअल सेल्फ ही सच्चिदानंद है। 

कहत कबीर सुनो भइ साधो ,सहज मिले अविनाशी। 

अपने अंदर उसे ढूंढना सहज है। बस जो मैं नहीं हूँ वह मेरा अज्ञान खत्म हो जाए जो इस शरीर को सच माने हुए है। शरीर तो एक टेन्योर है कालावधि है अभी है अभी नहीं है यही तो माया है :

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात  

कबीर ने अन्यत्र भी कहा  है :
मोको कहाँ ढूंढें रे बंदे मैं तो तेरे पास में।
भजन और शरणागत होना नाम सिमरन श्री गुरुग्रंथ साहब जी का सार है :

गुण गोविन्द गाइओ  नहीं ,जनम अकारथ कीन ,

कहु नानक हरि भज मना ,जिहि बिध जल कौ मीन। 

यहां भी जल का रूपक है जो मछली का जीवन है ,मछली को पका के खाने के बाद भी वह पानी मांगती  है।मच्छी जो खाते हैं वे जानते हैं इसे खाने के बाद प्यास ज्यादा लगती है। प्रीति  हमारी वाह गुरु से मछली जैसी होनी चाहिये थी लेकिन  हम ने इस जीवन को व्यर्थ कर दिया जीवन के व्यापारों में उसका (वाह गुरु का गुण गायन उसकी प्रशंशा उसके गुणों का बखान ही नहीं किया।  )यूं ही जीवन व्यर्थ गँवा दिया -मानुस जनम अमोल था कौड़ी बदले जाये। 
https://www.youtube.com/watch?v=h33YJ7zQ_dc
    
सन्दर्भ -सामिग्री :(१ )http://www.cnn.com/health

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं - जो एक ब्राह्मण ,स्वान तथा चांडाल को एक ही भाव से देखता और जानता है सभी में एक ही परमचेतन का अंश है वही वास्तव में देखता है।यही शंकर का अद्वैतवाद है -एक ही परम चेतना की परिव्याप्ति चहुँ ओर है ,जीवन में और जगत में ,जड़ में और चेतन में। यह कायनात उसी परमचेतन तत्व की अभिव्यक्ति है।

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके  ,गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। 

छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति ,पञ्चाग्नयों ये च त्रिणाचिकेता।  

           -----(कठोपनिषद ,प्रथम अध्याय ,दूसरी वल्ली का पहला श्लोक )

भावसार :ब्रह्मवेत्ता कहते हैं कि शरीर में बुद्धि रूप गुहा के भीतर प्रक्रिष्ट ब्रह्मस्थल में प्रविष्ट हुए अपने कर्म फल को भोगने वाले छाया और धूप के समान
परस्पर विलक्षण दो तत्व हैं। यही बात जिन्होनें तीन बार नचिकेताग्नि का चयन किया है वे पंचाग्नि की उपासना करने वाले भी कहते हैं। 

व्याख्या : कुलमिलाकर लब्बोलुआब यहां यह है कि क्या 'आत्मा' /'परमात्मा 'और 'जीवात्मा' दो अलग -अलग तत्व हैं। उत्तर है -समष्टि के स्तर पर जो परमात्मा है वही व्यष्टि  के स्तर पर आत्मा है। जब यह आत्मा एक इंटरनल अप्रेट्स अंतकरण :यानी मन -बुद्धि- चित्त -अहंकार चतुष्टय से संयुक्त होजाता है जब इसे एक शरीर मिल जाता है यही आत्मा  जीवात्मा कहलाने लगता है।जीवात्मा आत्मा की ड्रेस है उपाधि है ,पद है भले दोनों परस्पर भिन्न नहीं है लेकिन खुद को यह जीवात्मा सिर्फ काया (शरीर )मान लेने की भूल के कारण ,अपने अहंकार के कारण अलग मानने लगता है आत्मा से।ईश्वर से। 

इसको कठोपनिषद में नचिकेता यम संवाद के रूप में भी अन्यत्र मुंडक उपनिषद ( तीसरा अध्याय ,पहली वल्ली ,पहला श्लोक ),तथा श्वेताश्वर उपनिषद में भी एक रूपक के द्वारा समझाया गया है। 
'एक वृक्ष(काया ) पर ही (इस हृद गुहा में) दो पक्षी रहते हैं ,एक वृक्ष के फलों को खाता है ,कर्म करता है ऐसा मान लेता है तथा दूसरा निस्पृह भाव सब कुछ देखता है। पहला पक्षी ईश्वर दूसरा जीवात्मा है। जीवात्मा खुद को अहंकार के कारण करता -भोक्ता मान लेता है। जबकि न वह करता है न भोक्ता ,भुक्त है। ' 

यही बात वे ब्रह्म ग्यानी और नचिकेता -अग्नि- यज्ञ तीन बार संपन्न करने वाले कहते हैं ,लेकिन मुगालता यह है -ये आत्मा और ईश्वर  को दो भिन्न तत्व या सत्ताएं मानते हैं। जबकि एक स्वर्ण है (ईश्वर )तो दूसरा स्वर्ण के आभूषण। एक सूरज है तो दूसरा उसकी एक रश्मि एक किरण ,एक फोटोन। एक समुन्दर है तो दूसरा उसकी एक बूँद।

(बूँद सागर में विलय होने के बाद समुन्दर और स्वर्ण -आभूषण पिघलने के बाद स्वर्ण होकर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व खो देते हैं। मैं एक छोटी तरंग हूँ या सबसे बड़ी तरंग मैं ही हूँ ,मैं  लंबा, गोरा- चिट्टा या फिर नाटा हूँ सोच हमारे अज्ञान का ही नतीजा है। 

श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं - जो एक ब्राह्मण  ,स्वान तथा चांडाल को एक ही भाव  से देखता और जानता है सभी में एक ही परमचेतन का अंश है वही वास्तव में देखता है।यही शंकर का अद्वैतवाद है -एक ही परम चेतना की परिव्याप्ति चहुँ  ओर  है ,जीवन में और जगत में ,जड़ में और चेतन में। यह कायनात उसी परमचेतन तत्व की अभिव्यक्ति है।  

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

इस्लामाबाद की धरती पर भी ,ध्वज लहराना चाहते हैं। और ये खवाब बेशक पूरा होगा ,यौवन में वो ताकत है , शेरों के जो दांत गिने ,रक्त में वही हिमाकत है। पर भरतवंशियों की हालत आज ,शर्म आती है बताने में हम नाक सिकुड़ने लगते हैं ,एक कागज़ का टुकड़ा उठाने में।

बस रिवाज़ है एक भूमिका बनाने का ,

उसी के तहत फ़र्ज़ हम भी ये फ़र्ज़ निभाते हैं ,ज़माने को ये बताते हैं -

एक निगाह उन पर भी डालो -

जो गली कूचों का मौसम बे मौसम ,

बारहमासी कचरा बारहमास उठाते  हैं।

ये 'हाथ' न हो तो शहरों का नज़ारा क्या हो?

 दिल्ली वासी देख चुके हैं  केज्रबवाल दिखला चुके हैं उन्हें ये तमाशा -

क्या हाल हो दिल्ली का गर सफाई कर्मी हाथ पे हाथ धरके बैठ जाएं?  


हर बरस अमरीका आना होता है बरसों से यही  क्रम  ज़ारी है इसीलिए जब अपने देश भारत लौटता हूँ प्रवास की अवधि भुगता कर तब सोचता हूँ। कितनी साफ़ सफाई रहती है यहां कूचा कूचा गली गली। सफाई कर्मियों को यहां अमरीका में  उतना ही आदर सम्मान प्राप्त है जितना किसी अन्य पेशा कर्मी को।

कितना फर्क है यहां नागर बोध में और हमारे हिन्दुस्तान के नागर बोध में -

वह हिन्दुस्तान जो पैट तो रखता है कुत्ता -शौक़ीन तो है  लेकिन 

-उसका एक्स्क्रीटा सड़क गली -कूचों की तो कौन कहे पार्कों में भी छोड़ आता 

है।

जबकि यहां स्वान भी पर्यावरण का हिस्सा है। माई होम इज़ वेअर माँ डॉग इज़।

यहां  सब पैट- मालिकों के हाथ में आप एक पूपर स्कूपर (संडासी )देखियेगा जिससे वह पू उठाते हैं और एक पॉलिथीन बैग में रख लेते हैं अपने घर लाके वेस्ट बॉक्स में डालते हैं। वहां -वहां उन राज्यों में जहां सड़क के किनारे ही ऐसे बक्से लगें हैं जिनमें आप ये स्वान -मल (Dog excreta )डाल  सकते हैं लोग इनका इस्तेमाल करते हैं। सैनिटाइज़र्स भी यहां आपको मिल जाएगा।

सिरीफोर्ट स्टेडियम ,नईदिल्ली  और गुलमोहर पार्क कॉलोनी (जिसे जर्नलिस्ट कालोनी ) के निकट एक' गुलमोहर पार्क' है। यहां आपको कई सभ्रांत ,स्वान (कुत्ता )टहलाते मिल जाएंगे। एक्स्क्रीटा करवाने लाते हैं इन्हें भी सुबह -शाम की सैर के वक्त। एक मर्तबा इनमें से कई लोगों से मैंने बे -लाग कहा -भाई साहब मैं आपको गिफ्ट में पूपर स्कूपर लाकर दे सकता हूँ कृपया आप अपनी  कॉलोनी में पहल कीजिये स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनिए।

प्रियोक्तियाँ बोलीं इन लोगों ने कहा हाँ हमें ये बात अच्छी लगी है। देखते हैं। बस आज तक वह देख ही रहें हैं। आप भी वहां जाके देख सकते हैं। नज़दीक में ही 'नीतिबाग -पार्क' है -यहां कुत्ता लाना मना है।

साफ़ रहता है यह पार्क। चारों तरफ यहां सुप्रीम कोर्ट के वकील -ही वकील हैं ,कई कांग्रेसी प्रवक्ता -नुमा- उकील भी यहां सैर करने आते हैं ,इस मामले में इनकी तारीफ़ करनी पड़ेगी अपना कुत्ता यहां नहीं लाते अलबत्ता सड़कों को ये भी गंधाते हैं अपने पैट्स के मार्फ़त उनके टट्टी पेशाब से।

कब बनेगी 'दिल्ली' 'चंडीगढ़' जहां कई इलाके ये पहल कर चुके हैं। कब होगा मेरा वृहत्तर भारत इस स्वच्छता अभियान में शामिल अपने मन से तन से,धन से।

और कुछ नहीं तो हम अपने पुराने कपड़े जो आजकल हमारे पास बे -हिसाब होते हैं इन कचरा बीनते ,हाथ -गाड़ियों में ले जाते ,सड़कों को बुहारते कुछ दरिद्र - नारायणों को दे सकते हैं। श्राद्ध पर्व पर इन्हें कुछ दे सकते हैं भोजन -पानी ,वो लें लेंवे ये उनका बड़प्पन होगा जो कुछ भी हमारे पास है वह उस 'एक' का ही दिया हुआ है,हमारा तो ये तन भी नहीं है। मात्र किराए का मकान है ये शरीर भी जिसे हम मेरा -मेरा कहते हैं।
हवा -पानी -जल -पृथ्वी -आकाश   पाँचों मालिक हैं इस तन के हमारे पर्यावरण के ,हमारे 'होने' की सलामती के इन्हें ही हम गंधा रहें हैं बे -हिसाब।

पांच तत्वों से ये कैसी दुश्मनी है भाई ?


पढ़िए सुनिए  एक जोशीले होनहार छात्र अपूर्व विक्रम शास्त्रा के  उद्गार :शतश :प्रणाम इस मेधा को देश के प्रति इस समर्पण भाव को :

((सन्दर्भ -सामिग्री :स्वच्छ जमीन हवा और पानी।

Sherwood School ,Nainital (NDTV DETTOL BANEGA SWACHH BHARAT ))


जो सरहद पर तो जा न सके ,पर अपना फ़र्ज़ निभाते हैं

                                                             ------------------(अपूर्व विक्रम शाश्त्र ,कैप्टेन शेरवुड स्कूल नैनीताल )

जो सरहद पर तो जा न सके ,पर अपना फ़र्ज़ निभाते हैं ,

अस्वछता नामक   शत्रु से ,भारत देश बचाते हैं ,

दो  पल वतन के आज ,उनके नाम करता हूँ ,

जो सड़क नाले साफ़ करते, उन्हें सलाम  करता हूँ।

घिन आती है लोगों को जिनसे ,

ज़माना जिन्हें धिक्कारता है ,
 वो ही सच्चा सैनिक है ,जो गंदगी को मारता है।

तो दुनिया की नज़रों में जो कूड़े कबाड़ी  -वाला है ,

सही मायने  में वही  हिन्दुस्तां  का रखवाला  है।

यूं तो हम सब सरहद पर, पौरुष दिखलाना चाहते  हैं ,

इस्लामाबाद की धरती पर भी ,ध्वज  लहराना चाहते हैं।

और ये खवाब बेशक पूरा होगा ,यौवन में वो  ताकत है ,

शेरों   के जो दांत  गिने ,रक्त में वही हिमाकत है।

पर भरतवंशियों की हालत आज ,शर्म आती है बताने में

हम नाक सिकुड़ने  लगते हैं ,एक कागज़ का टुकड़ा उठाने में।

तब सोचता हूँ ,ये दौर ऐसा कर लेगा ,

क्या सचमुच अपने हाथों में, वसुंधरा अंबर लेगा ,

अस्वछता से मैत्री है तो रजतिलक क्या लगायेंगें ,

जो हाथ झाड़ू उठा न पाएं  , संगीन कैसे चलाएंगे।

सरहद सैनिक बचा लेंगे ,बैठे वतन की साधना में। .

हम भी तो कुछ अर्पण कर दें ,भारत माँ की अराधना में।

एक भीष्म प्रतिज्ञा  अब ,हर जन  भारत का ले -ले ,

अटूट प्रेम  स्वच्छता से ,हर मन भारत का ले -ले ,

तो युद्ध का एलान अब ,गंदगी के खिलाफ  हो ,

मांग शोणित  की जनता से है , देश का कचरा साफ़ हो

जो हाथ झाड़ू उठा न पाए वो , संगीन क्या उठा पाएंगे ?

हुक्मरानों से  उम्मीद यही, आशा है  जवानी से ,

इल्तज़ा  गांधीवाद की ,हर एक हिन्दुस्तानी से ,

सन्देश हमारा जमाने भर में ,हर पहर जाएगा

जम्बू दीप का जयघोष गगन में  ,बेशक घहर जाएगा ,

भले खून न बहाये सरहद पर

एक छिलका  अदब से उठाइये

बिना पवन ही  अम्र  तिरंगा यूं ही लहर जाएगा। ........ (अपूर्व विक्रम शास्त्र )

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=waRTWkyF6_o

(२ )https://www.youtube.com/watch?v=-CFwUE-jEv8

(३ )https://www.youtube.com/watch?v=FmgXrH_tybo

(४ )https://www.youtube.com/watch?v=4T3kvppa2T4

(५ )https://www.youtube.com/watch?v=-CFwUE-jEv8

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

'साकत- गीत नाद संग (तुम )गावत ' (अश्लील भाव वाला संगीत साकत - गीत है )साकत -संगीत कहा गया है । वासना ही सिर चढ़के बोलेगी इस संगीत को सुन के। बाबा फरीद कहते हैं : 'हाथ न लया कुसुम्बड़े जल जासी ढोला ' इसलिए इस 'काम -रस' को 'नाम- रस' में बदलो !कन्वर्ट करो अपनी एनर्जी को।


शुभ काज को छोड़ अकाज करें , कछु लाज न आवत है इनको , एक रांड बुलाय नचावत हैं ,घर को धन -धान (धाम,धान्य ) लुटावन को मृदंग तिन्हें धृक -धृक कहे ,सुलतान कहे किनको किनको , बांह उसार के नारि कहे ,इनको इनको इनको। -------(कवित्त -प्रिंसिपल श्री गंगा सिंह जी ) भाव -सार कवित्त का : अच्छे संगीत कारज को छोड़ साकत संगीत सुन ने आएं हैं ,घर का धन धान्य सब कुछ लुटाने को तत्पर हैं एक नचनिया की मुद्राओं पर ,अंग संचालन पर ,भाव -भंगिमाओं पर। यहां सुलतान का अर्थ घुँघरू है। मृदंग की आवाज भी कहती है -धिक्कार -धिक्कार है। किनको ?किनको ?घुँघरुओं की आवाज़ ज़वाब देती है -इनको ,इनको -नर्तकी इशारा करते हुए कहती है जो पैसे खर्च करके नाच देखने आये हैं इनको इनको इनको।

सारा संगीत सात सुरों की आराधना है ,सप्तक है। नाद है। अब ये आपके ऊपर है चाहे आप वह संगीत सुने जिसे मस्ज़िदों ने वर्जित कर दिया था ,किया हुआ है ,जो रूह को भटकाता है ,बदन के भोग नाभि के नीचे के संबंधों की ओर  ले जा सकता भटका कर। या फिर नाद सुने दिव्यसंगीत सुने जो आत्मा को बदन से छिटका कर परमात्मा की ओर  उन्मुख कर सकता है।

दरअसल दोष संगीत में न था तकनीक के गलत प्रयोग में था वरना आज भी मज़ारों पर सूफी संगीत ,कव्वाली ,नाद आदि गाई बजाई जाती है। देवदासियों की परम्परा भी तकनीक के गलत इस्तेमाल की वजह से खासी बदनाम हो चुकी है।

वरना भरत नाट्यम में शिव स्तुति भी है ,कथ्थक में रास भी है।

कजरी ,चैती ,रागिनी आप को  पसंद है या ठुमरी ,लोक संगीत का अपना माधुर्य ,कथाएं और वैशिष्ठ्य है ,तो भक्ति संगीत शबद -कीर्तन जिसके बारे में कहा गया है :

'कल जुग केवल नाम अधारा ,

सिमर -सिमर नर उतरहि   पारा '

और यह भी  :

कलियुग में कीर्तन परधाना ,

गुरमुख जपिये लाये ध्याना।

चयन आपका है साकत -संगीत (दुष्ट तत्वों को बढ़ाने वाला )सुनिएगा  या नाद जिसे ब्रह्म कहा गया है । स्वर को सुरति से जोड़िएगा तो लौ लगेगी।

'सुखेन बैन रत्नन'यानी सुख देने वाली कथित बातें ?

जिसे आप चाट (चैट )कहते हो करते हो और समझते हो 'ये बड़े  काम की चीज़  है'। हाँ !वासना से जुड़ी  बातें "काम "से ही जोड़तीं हैं ज्यादातर चैटिंग।

और  "काम "वो शै है जो पूरा न होने पर क्रोध में बदल जाता है। 

कुसुम्ब का फूल बन जाती हैं 'ये 'काम' की बातें 'चैट (चाट ही है ये बदन की ). 

ये वासना वाली बातें सुखदायी नहीं हैं (सुखेन बैन रत्नन ).


'साकत- गीत नाद संग (तुम )गावत '

(अश्लील भाव वाला संगीत साकत - गीत है )साकत  -संगीत कहा गया है ।

वासना ही सिर चढ़के बोलेगी इस संगीत को सुन के।

बाबा फरीद कहते हैं :

'हाथ न लया  कुसुम्बड़े  जल  जासी ढोला '

इसलिए इस 'काम -रस' को 'नाम- रस' में बदलो !कन्वर्ट करो अपनी एनर्जी को।

 सात सुरों के भांडे में क्या पाना है ये आपकी मर्जी है। 

राग तो एक एनर्जी है। 'सुखेन बैन वह राग है 'जो नाम से जोड़े परमात्मा के। 

  जब हम परमात्मा का नाम सुनेंगे। तभी लौ लगेगी।

वरना -

शुभ काज को छोड़ अकाज करें , कछु लाज न आवत है इनको ,

एक रांड बुलाय नचावत हैं ,घर को धन -धान (धाम,धान्य )  लुटावन को

मृदंग   तिन्हें धृक -धृक कहे ,सुलतान कहे किनको किनको ,

बांह उसार के नारि कहे ,इनको इनको इनको।

             -------(कवित्त -प्रिंसिपल श्री गंगा सिंह जी )

भाव -सार कवित्त का :
अच्छे संगीत कारज को छोड़ साकत संगीत सुन ने आएं हैं ,घर का धन धान्य सब कुछ लुटाने को तत्पर हैं एक नचनिया की मुद्राओं पर ,अंग संचालन पर ,भाव -भंगिमाओं पर।

यहां सुलतान का अर्थ घुँघरू है।

मृदंग की आवाज भी कहती है -धिक्कार -धिक्कार है। किनको ?किनको ?घुँघरुओं की आवाज़ ज़वाब देती है -इनको ,इनको -नर्तकी इशारा करते हुए कहती है जो पैसे खर्च करके नाच देखने आये हैं इनको इनको इनको।

जयश्रीकृष्ण !

सन्दर्भ -सामिग्री :

https://www.youtube.com/watch?v=dgKoZ937LHc

https://www.youtube.com/watch?v=vBmZF8ek0_A

बुधवार, 27 सितंबर 2017

मानस में तुलसी बाबा कहते हैं : जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरति देखि तीन तैसी

मूलमंत्र (गुरु ग्रन्थ साहब का पसारा -भाव -सार अंग्रेजी और हिंदी दोनों मे ):

Mool Mantra :

"Ekonkar ,Satnam ,Karta-purakh ,Nirbhya ,Nirvair ,

Akal -Murat ,Ajuni, Saibhang ,Gur Parsadi "


Creator and His Creation (made up  of the mode of good - ness,mode of action and mode of ignorance,Sat ,Rajo ,Tamo  ) are one -"Ek Ongkaar"

He is outside time and is present now ,was present then ,   and  will be present  in the future .His existence is the only truth . -"Satnam "

He is the creativity which is happening and not the doer .Whatever is happening is happening because of the truth existence (Satnam )-"Karta Purakh "

He is without fear since there is only God and no second.He is revenge less , He is without an enemy .-"Nirbhya Nirvair "

His reflection (Image )does not change with time .He is beyond all species.He is neither male nor female.His image is beyond time and is without a form .-"Akaal Moorat "

He is not one of the species and does not enter the womb of a mother's uterus .He is without a body and hence anatomy and is all pervading present every where now then and in the  future at the same time ."Nanak" is a light of enlighenment  which is shown on to Nanaku -The Body of Gurunanak dev ,who had parents .Nanak has none .-"Ajooni" .

He is self illuminating ,self luminous ,self irradiated ."Sabhang "

The same light "Jot"travels through Nanaku to Guru Govind Singh Ji.

Vaah -Guru !

My Guru is wonderful .

He is the macro -cosmic supra -consciousness. He is everlasting bliss .-"Gur Parsadi "

भाव -सार :

सृष्टि -करता और सृष्टि ,रचता और रचना एक ही है।करता और कृति , रचना उस रचता की ही साकार अभिव्यक्ति है। उसका अस्तित्व काल -बद्ध एक अवधि मात्र ,एक टेन्योर भर नहीं है उसका अस्तित्व ही एक मात्र सत्य है ,सनातन है -आज भी वही सत्य है कल भी वही था और आइंदा भी वही रहेगा। इसीलिए कहा गया वही सत्य है सत्य उसी का नाम है (राम नाम सत्य है -भी इसीलिए कहा  जाता है ).. यह सृष्टि एक प्रतीति है जस्ट  एन  एपीरिएंस। उसका नाम ही एक मात्र सत्य है। 

जो कुछ भी घट रहा है बढ़ रहा है यहां सारा सृजन ,सारी गति ,इलेक्ट्रॉन की धुक -धुक ,परिक्रमा  और नर्तन ,कर्म -शीलता उसी से है। करता नहीं है वह दृष्टा है इस कायनात का। 

नाम काम बिहीन पेखत धाम, हूँ नहि जाहि ,

सरब मान सरबतर मान ,सदैव मानत ताहि। 

एक मूरति अनेक दरशन ,कीन रूप अनेक ,

खेल खेल अखेल खेलन ,अंत को फिर एक। 

उसके अलावा और किसी का अस्तित्व है ही नहीं जो दीखता है उसकी ही माया है। इसी माया की वजह से वह खुद अगोचर बना रहता। 

इसीलिए वह निर्भय-निर्वैर है -

न काहू से दोस्ती ,न काहू से वैर,
कबीरा खड़ा सराय में ,सबकी चाहे खैर। 

उसका कोई रूप नहीं वह अरूप है। निराकार -निरंजन है वह इसीलिए सर्व -व्यापक सब थां पर हैं। उसकी छवि आभा कांति रिफ्लेक्शन या इमेज समय के साथ छीजती बदलती नहीं है। उसका कोई रूप नहीं है और सब रूप उसी के हैं। कोई एक धाम नहीं है और सब धाम उसी के हैं। वह विरोधी गुणों का प्रतिष्ठान है। 

वह किसी माँ के गर्भ में न आता है न जाता है। 

"पुनरपि जन्मम ,पुनरपि मरणम ,

पुनरपि जननी जठरे शरणम् ". 

यह उक्ति  हम प्राणियों के लिए है। वह न कहीं आता है न कहीं  जाता है। वह  दूर से दूर भी है और नेड़े से भी नेड़े निकटतम भी है ,हृद गुफा में वही तो है ,मेरा रीअल सेल्फ। 

वह स्वयं प्रकट  हुआ है ,स्वयं आलोकित है। सर्वत्र उसी का यह आलोक है। स्वयं -भू है वह। 

चेतन (गुर )वही है -परम चेतना भी। वह ऐसा आनंद है (परसादि )जो समय के साथ कम नहीं होता है। व्यष्टि  के स्तर पर वही "आत्मा" है ,समष्टि  के तल पर "परमात्मा"।"मैं" भी वही हूँ "तू" भी वही है। फर्क है तो बस उसके और मेरे (हमारे )परिधानों ,कपड़ों में है। मेरे कपड़े मेरा यह तन है जिसे मैं अपना निजस्वरूप माने बैठा हूँ ,यह अज्ञान मेरे अहंकार से ही आया है। उसके वस्त्र माया है। त्रिगुणात्मक (सतो -रजो -तमो गुणी सृष्टि )है।

माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म को  ही ईश्वर कहा गया है। ब्रह्म के भी दो स्वरूप हैं 

(१ )अपर ब्रह्म और :अपर ब्रह्म ही माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म होता है 

(२ )परब्रह्म या पारब्रह्म  परमचेतन तत्व है "गुरप्रसादि "का "गुर "
है। परमव्यापक चेतना है। 

विज्ञानी कहते हैं सृष्टि भौतिक तत्वों से बनी है -बिगबेंग प्रसूत ऊर्जा से इसकी निर्मिति हुई है। लेकिन आध्यात्मिक सनातन दृष्टि इसे परम -चेतना "गुर "ही मानती है। 

जयश्रीकृष्ण। 

महाकवि पीपा कहते हैं :

 सगुण  मीठो खांड सो ,निर्गुण कड़वो नीम ,

जाको  गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम। 

मानस में तुलसी बाबा कहते हैं :

जाकी रही भावना जैसी ,

प्रभु मूरति देखि तीन तैसी। 

शिवजी पार्वती जी से मानस के ही एक प्रसंग में अपना अनुभव कहते हैं :

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना ,

सत हरिभजन जगत सब सपना। 

यानी संसार एक प्रतीति मात्र है सत्य केवल "सतनाम 'ही है। 

सन्दर्भ :https://www.youtube.com/watch?v=fCehIP7AQBI

वाहे गुरु जी का खालसा वह गुरूजी की फतह।  

Reference :

(1)https://www.youtube.com/watch?v=W9Q69tkRRVI

सोमवार, 25 सितंबर 2017

बीएचयू में षडयंत्रकारी तत्वों का जमघट


बीएचयू में षडयंत्रकारी तत्वों का जमघट


प्रधानमन्त्री अभी हवाईजहाज में बैठे ही थे ,मार्क्सवाद के बौद्धिक गुलामों में जिनके सरदार येचारी सीताराम बने हुए हैं ,सपाई के छटे हुए षड्यंत्रकारी तत्व ,पाकिस्तान विचार के स्थानीय जेहादी तत्व जिनमें अपने को सबसे पहले मुसलमान मानने शान से बतलाने वाले लोग ,ममताई लफंडर आईएसआई के स्लीपर सेल के लोग,हाय ये तो कुछ भी नहीं हुआ कह के  हाथ मलके चुप नहीं बैठे उन्होंने अपनी लीला दिखला दी।

 मुद्दा था एक केम्पस छात्रा  के  साथ कथित बदसुलूकी दूसरी का अपने को खुद ही घायल कर लेना और तीसरी का सर मुंडा लेना। प्रधानमन्त्री कि यद्यपि यह कांस्टीटूएंसी है लेकिन प्रधानमन्त्री का काम गली -गली घूमके इन षड्यंत्रों को सूघ लेना नहीं होता है वह आये और अपना सकारात्मक काम अंजाम देकर चले गए।

योगी आदित्य नाथ खुद क्योंकि षड्यंत्रकारी नहीं रहे हैं मुलायमतत्वों की तरह ,वह अंदर खाने पल रही इस साजिश की टोह नहीं ले सके। यूनिवर्सिटी के वाइसचांसलर ने घटना पर खेद व्यक्त करते हुए कहा है जो हुआ वह खेद जनक है लेकिन मुझे घटना को ठीक से समझने तो दो।वह भी हतप्रभ हैं।

अजीब बात है हालांकि शरदयादव के लोग  वहां इम्प्लांट नहीं किये गए थे लेकिन ये ज़नाब घटना की निंदा करने वालों में सबसे आगे रहे।

अब ये भारतधर्मी समाज का काम है वह आमजान को बतलाये बीएचयू को जेएनयू में बदलने की साजिश करने वाले कौन -कौन से कन्हैया तत्व हैं जो मौके का फायदा उठा रहे हैं। बीएचयू एक बड़ा कैंपस है यहां हैदराबादी ओवेसी -पाकिस्तान सोच के लोग भी पढ़ने की आड़ में घुस आये हैं ,सीधे -सीधे पाकिस्तान सोच के लोग भी ,ममता की नज़र पूजा - मूर्ती विसर्जन से पहले ऐसे दंगे करवाने की बनी हुई है ताकि अपनी सोच को वह ठीक ठहरा सकें। इन्होने हाईकोर्ट के आदेश को नहीं माना सुप्रीम कोर्ट इसलिए नहीं गईं कि और फ़ज़ीहत होगी लिहाज़ा अपनी सोच को जायज सिद्ध करने करवाने के लिए वह हिन्दुस्तान में जगह -जगह दंगे प्रायोजित करवाने की ताक  में हैं उनके लोग भी बीएचयू पहुंचे पहुंचाए गए हैं।  यकीन मानिये बहुत जल्दी इन की बखिया उधड़ेगी लेकिन भारतधर्मी समाज को इस वेला देश- विरोधी  पाकिस्तान और आईएसआई समर्थक सोच के लोगों पर बराबर निगाह जमाये रखनी है। जैश्रीकृष्णा।  

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

भारत को आज़ादी उस सांस्कृतिक धारा ने ही दिलवाई थी जो परम्परा से शक्ति की उपासक थी । यह आकस्मिक नहीं है कि राष्ट्रगान और वन्देमातरम का प्रसव उस बंगाल की धरती पर ही हुआ जो परम्परा से शक्ति की, माँ दुर्गा की उपासक थी। उसी परम्परा को तिलांजलि दे खुद को दीदी कहलवाने वाली नेत्री ममता आज मूर्ती विसर्जन को एक दिन आगे खिसकाने की बात करती है क्योंकि मुसलमानों का २७ फीसद वोट फ्लोटिंग वोट है यह उस सांस्कृतिक धारा के साथ भी जा सकता है जो गांधी की आत्मा में वास करती थी जो मरते वक्त भी "हे राम "से संयुक्त रहे।

 रोहंग्या जेहादी तत्वों के समर्थन में उतरे मान्य रक्तरंगियों (लेफ्टीयों ,वामियों ),सोनिया के बौद्धिक गुलाम सम्मान के योग्य पिठ्ठुओं एक बात समझ लो। यदि यह देश आज़ाद हुआ तो उस नेहरू वंश की वजह से नहीं जिसके लाडले नेहरू ने उन अंग्रेज़ों की परम्परा को ही आगे बढ़ाया था जो भारत -द्वेष पर ही आधारित थी। नेहरु का मन विलायती ,काया मुसलमान  और.... खैर छोड़िये .. बात सांस्कृतिक धारा की हो रही थी उसी पर लौटते हैं। 

भारत को आज़ादी उस सांस्कृतिक धारा ने ही दिलवाई थी जो परम्परा से शक्ति की उपासक थी । यह आकस्मिक नहीं है कि राष्ट्रगान और वन्देमातरम का प्रसव उस बंगाल की  धरती पर ही हुआ जो परम्परा से शक्ति की, माँ दुर्गा की उपासक थी। उसी परम्परा को तिलांजलि दे खुद को दीदी कहलवाने वाली नेत्री ममता आज मूर्ती विसर्जन को एक दिन आगे खिसकाने की बात करती है क्योंकि मुसलमानों का २७ फीसद वोट फ्लोटिंग वोट है यह उस सांस्कृतिक धारा के साथ भी जा सकता है जो गांधी की आत्मा में वास करती थी जो मरते वक्त भी "हे राम "से संयुक्त रहे।

सुयोग्य लेफ्टीयों तुम्हारे बीच सबसे ज्यादा बेरिस्टर रहे हैं कमोबेश तुम्हारा नाता बंगाल से गहरा रहा है जहां से आये प्रणव दा राष्ट्रपति के रूप में अपने आखिरी दिन विदा वेला में भारत के प्रधानमन्त्री मोदी से ये कहलवा लेते हैं "भले माननीय राष्ट्रपति मेरी कई बातों से सहमत न थे लकिन उन्होंने अपने पिता समान नेह से मुझे कभी वंचित नहीं रखा।" यही है भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक धारा जो एक तरफ राजा राम के गुण गाती है , मानस- मंदिर में (वाराणसी ) पूजा करती है ,शिव के तांडव और सदा शिव रूप (मंगलकारी )को भी नहीं भूलती।

जेहादी तत्वों के पोषक देश भंजकों अपनी मूल धारा में लौटो -भले मार्क्सवाद की बौद्धिक गुलामी करो लेकिन जेहादी रोहंग्या के साथ मत फिरो गली- कूचों में ,जेहादी तत्वों को यहां से दफह होना ही होगा ,तुम काहे बुरे बनते हो ?

ये देश तुम्हारा सम्मान करेगा।इसकी रगों में बहने वाले खून को पहचानो।  भारत धर्मी समाज  तुम्हें भी गले लगाएगा।
जैश्रीकृष्णा जयश्रीराम जयहिंद के सेना प्रणाम। 

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन