मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता। गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

बहुत  नहीं सिर्फ  चार कौवे थे काले ,उन्होंने ये तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें ,रुकें ,खाएं और गायें ,वे जिसको  त्यौहार कहें सब उसे मनायें  .

कभी -कभी जादू हो जाता  दुनिया में ,दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया  में ,

ये औगुनिये चार बड़े सरताज हो गये  ,इनके नौकर चील गरुण और बाज़ हो गए।

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में ,हाथ बाँध कर खड़े हो गए सब विनती में ,

हुक्म हुआ चातक पंछी रट  नहीं लगाएं ,पिऊ -पिऊ को छोड़ कांव -कांव ही गाएँ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को ,खाना पीना मौज़ उड़ाना छुटभैयों को ,

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में ,बड़े बड़े मनसूबे आये उनके जी में।

उड़ने तक के नियम बदल कर  ऐसे ढाले ,उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले।

आगे क्या हुआ सुनाना बहुत कठिन है ,यह दिन कवि  का नहीं चार कौओं का दिन है ,

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना ,लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह  सुनाना।

                          -----------------------  (भवानी प्रसाद मिश्र )

कविता -संग्रह ' जी हाँ मैं गीत बेचता हूँ किस्म -किस्म के गीत बेचता हूँ। ' से साभार।

                               ----------------------------------(भवानी प्रसाद मिश्र )
प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरु भाई )

भावसार :भवानी भाई की ये कविता आपातकाल में तब लिखी गई थी जब इस देश की तमाम संविधानिक व्यवस्थाओं  के ऊपर एक इंद्रा -जी  पालती मारकर  बैठ गईं थीं।महज़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय के फैसले को धता बताते हुए तब उन्होंने जो सन्देश दिया था भारत के जन-मन को उसका खुलासा यह कविता बेलाग होकर करती है। यह वह दौर था जब  तमाम छद्म मेधा उनकी हाँ में हाँ भयातुर होकर मिलाने लगी  थी। लेकिन उस दौर में भी दुष्यंत कुमार और भवानी दा जैसे लोग थे जिन्होंने अपनी अस्मिता को बचाके रखा था और ये कविता दागी थी उस समय की दुर्दशा से संतप्त होकर:

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की  मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता।
गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

ये वो लोग थे जो यह कहते समझते थे -जब हम पैदा हुए थे तभी से इस सृष्टि का निर्माण हुआ है । उस व्यववस्था के ध्वंश अवशेष आज भी अपने बेटे का नाम प्रभात रखके ये समझते हैं हमने सूरज को पाल लिया है। वह भी तभी निकलेगा जब हम चाहेंगे।

इसी इंद्रावी तंत्र के कुछ अवशेष और चंद कट्टर पंथियों की गोद  में पोषण पाते हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए आज मोदी को फूंटी आँख नहीं देख पा रहे हैं। जानते हैं किसलिए :

वह इसलिए अब सूरज नियमानुसार उदित हो रहा है किसी का पालतू नहीं है। 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं।

शिखर से शून्य तक की यात्रा 

मरणासन्न रावण लक्ष्मण  के प्रश्नों का उत्तर देते हुए  सीख देता है :

(१)इच्छाओं की पूर्ती से इच्छाओं का अंत नहीं होता ,इच्छाएं और बढ़ जाती हैं ,इच्छाओं का रूपांतरण करना पड़ता है मैं यहीं चूक गया। 

(२)शुभ काम के करने में कभी देरी नहीं करनी चाहिए और अशुभ के करने में जल्दी। 

(३ )अपने शत्रु की क्षमताओं को कभी भी अपने से कम आंक के नहीं देखना ये मेरी तीसरी भूल थी मैं इसी गुमान में रहा एक वनवासी वानर ,एक मनुष्य मेरा क्या मुकाबला करेगा। यह रावण की लक्ष्मण  को तीसरी सीख थी। 

(४ )कभी अपने जीवन की गुप्त बातों को किसी के सामने प्रकट न करना मैंने एक बार यह गलती की थी विभीषण को अपनी मृत्यु का राज बतला दिया था ,जिसका खामियाज़ा अब मैं भुगत रहा हूँ। 

'हम काहू के मरहि न मारे ,
वानर मनुज जाति दुइ मारे। '-यही वर माँगा था रावण ने शिवजी से ,ब्रह्मा जी से ,रावण तप और तपस्या दोनों के फलितार्थ का दुरूपयोग करता है। 
रावण नीति थी संस्कृति को नष्ट करना सरस्वती को हासिल करके। मेधा के दुरुपयोग  की शुरुआत ही रावण नीति थी।हमारे लेफ्टिए इसका साक्षात प्रमाण हैं।  

रावण ने  पहले तप करके अनेक वरदान अर्जित किये ,फिर उनका गलत प्रयोग करके शाप कमाए। 

जो खुद रोये और दूसरों को भी रुलाये वही रावण है। 'राव' से रावण। 

जो अपनी पुत्र -वधु को न  छोड़े उसका नाम रावण है। 

नल कुबेर का शाप था जिसकी वजह से  रावण ने  सीता के अपहरण  के बाद उनका स्पर्श नहीं किया।पर नारी का उसकी  सहमति के बिना उसका मस्तिष्क सौ टुकड़ा हो जाता।  
जो अपनी बहन को विधवा बना दे उसका नाम रावण है। 

महत्वकांक्षी रावण का कोई सम्बन्धी नहीं होता। बस एक महत्वकाँक्षा की आपूर्ति ही उसका लक्ष्य होता है। रिश्ते उसके लिए बोझ थे जिनका उसने बहुत दुरूपयोग किया।यहां तक की पार्वती को हासिल करने की उसने कुचेष्टा की।  
सेटिंग और दलाली ही रावण वृत्ति है रावण की सौगातें हैं। संतानें हैं। बलवान दिखे तो उससे माफ़ी मांग लो कमज़ोर दिखे तो उसे जीत लो। यही रावण वृत्ति थी।बाली उसे छ:  तक अपनी कांख में दबाये रहा। उससे माफ़ी मांग बाहर आकर डींग हांकने लगा।  
दो कुंठाएं भी थीं रावण की -कोई भी सुन्दर स्त्री उस पर मोहित नहीं होती थी। बस वह उठाकर ज़रूर ले आता था सौंदर्य को। दस सिर वाला काला-कलूटा रावण - सौंदर्य उसका क्या करे। 
रावण भीड़ का नेता था। भगवान्  समूह बनाते हैं। भीड़ के कोई सिद्धांत नहीं होते ,भीड़ का कोई चेहरा भी नहीं होता। राम समूह बनाते हैं वह भी स्थानीय तौर पर उपलब्ध मानव संशाधनों का। 

मानस की यह सीख है :प्रकृति और परमात्मा का कभी अपमान नहीं करना ,हम आज अशांत इसीलिए हैं भगवान् की जो प्रकृति अभिव्यक्ति है,भगवान् की जो शक्ल है  उसी प्रकृति  के साथ हम खिलावड़ कर रहें हैं। कहीं पेड़ काट रहें  हैं कहीं खदानों को डाइनेमाइट लगाकर उड़ाते हैं।

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। 

सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं। 
रावण शान्ति भंग करता है। 
राम संस्कृति की रक्षा के लिए आये थे एक सीता को रावण से मुक्त कराने के माध्यम से वह सारे संसार की  पीड़ित महिलाओं के अनुरक्षण के लिए आये थे -जब -जब भी किसी महिला का अपहरण होगा राम आयेंगे।
आज जहां -जहां वैष्णव तरीके से जीने वाले पति -पत्नी में तनाव है ,वहां उसकी वजहें आपसी समझ का अभाव है क्योंकि पढ़े लिखे लोगों के बीच में विमत का रहना लाज़िमी है और इसमें बुरा भी कुछ नहीं है ,अब परिवार चलेगा तो समझ से ही चलेगा। एक दूसरे की कमज़ोरियों के प्रति सहनशील होने से ही चलेगा। आज विवाह दो पॅकेजिज़ दो बैलेंसशीट्स के बीच गिरह गांठ है। विवाहेतर संबंध भी सामने आ रहे हैं दोनों के ,पति के भी पत्नी के भी। अरूप रावण दोनों में विद्यमान है। 

हालांकि घर में पैसा इफरात से है लेकिन सुख शान्ति नहीं है। समाधान क्या है ?

समाधान :अन्न का नियंत्रण अन्नपूर्णा को अपने हाथ में लेना पड़ेगा। खाना अपने हाथ का बनाके खिलाना पड़ेगा पति को। मन में प्रेम भाव रखते हुए पकाना पड़ेगा। इस अन्न से ही एक प्रेम संसिक्त मन बनेगा। 
रावण ने घरों के अन्न पर भी प्रहार किया है (प्रहार किया था )-खाना तो घर का बना खाइये भले आप के पास प्रतिमाह लाखों के पैकिज़िज़ हैं। 

हनुमान (भक्ति )यदि आपके हृदय में है तो आप अंदर के अरूप रावण से जीत जायेंगे,यकीन मानिये। 
जीवन प्रबंधन की दीक्षा है रामचरित मानस में ,हनुमान चालीसा में जिसका पाठ तीन से पांच मिनिट में संपन्न हो जाता है। हनुमान समस्याओं के समाधान के हनू -मान हैं। असंभव को सम्भव बनाते हैं हनुमान। हनुमान चालीसा के तीरों से मारा जाएगा अरूप रावण। 
जीवन एक नियम का नाम है परिवार के नियम ,समाज के नियम ,जो इन नियमों को तोड़ता है वह रावण तत्व का पोषण करता है। रावण अपनी योग्यता का दुरूपयोग करता है। मातृशक्ति का अपमान करता है। 
अच्छाई जहां कहीं भी हो स्वीकार कर लेना अपना लेना । बुराई अपनी जब भी दिखे स्वीकार कर लेना। हम रावण से अपने बचपन, जवानी और बुढ़ापे को बचाएं। 

ज्ञान की अति रावण को बर्बाद कर गई थी। आज नौनिहालों को इंटरनेट की अति से भी बचाने की जरूरत है। 

आज बच्चा पैदा होते ही उस नर्स को घूरने  लगता है जो कान से मोबाइल लगाए हुए है।  नर्स कहती है विस्मय से क्यों रे छुटके क्यों घूर रहा है मुझको।ज़वाब मिलता है ज़रा अपना मोबाइल दीजिए -भगवान्  को एसएमएस करना है मैं ठीक ठाक पहुँच गया।  
सन्दर्भ -सामिग्री :

https://www.youtube.com/watch?v=Js0B_JpEAgQ

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

इन दिनों ये हालात हैं मेरे भारत के :कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं।

इन दिनों ये हालात हैं मेरे भारत के  

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 

https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की :एक शहज़ादा अखिल भारतीय देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। पांच- पांच मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है।

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की 

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 

https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना , जहां कुमति तहाँ विपत निदाना .

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया डॉक्टर सतीश त्यागी जी 

आपने हमें  प्रस्तुत पोस्ट का कच्चा माल पकड़ा दिया।

बिलकुल सही निष्कर्ष निकाला है चेताया है इस मंदमति को -

"ये जीजू को मरवाएगा" 

इसमें एक कमज़ोरी अंग्रेजी भाषा की भी रही है -'जहां ब्रदर -इन -ला 'संज्ञा और सम्बोधन दोनों से ही यह पता नहीं

चलता कि जीजा कौन है और साला कौन है। इसलिए हिंदी भाषा ने -तमाम जीजाओं ने -बड़ी चालाकी से सालिग्राम

(साले साहिब अर्थात )

'आधे- मालिक' हमारे ये भी हैं कहकर तमाम सालों का परिचय करवाना कब का शुरू कर दिया था। ).हिंदी भाषा में कई

जगह ध्वनित अर्थ साले का गाली भी निकाला जाता है। खासकर जब हम किसी को चुनौती देते हुए देख लेने की धमक

देते हैं -कहते हुए साले तुझे तो देख लूंगा।

अब इस वंशीय राजकुमार के यहां तो परम्परा से संबंधों का मतलब जैविक -संबंध ही रहा है। इसीलिए एक मर्तबा इनकी

बहिना के लिए अपने एक सम्बोधन में  नरेंद्र मोदी ने  कहा -वह तो मेरी बेटी समान है ,बेटी ही है तो अगले दिन इनका

रिजॉइंडर चला आया -मेरे पिताजी तो राजीव गांधी थे मैं किसी की बेटी फेटी नहीं हूँ।

यहां ज़नाब सतीश त्यागी जी 

रागात्मक संबंधों के लिए गुंजाइश ही नहीं है। 

राहुल अपनी कुशाग्र -बुद्धि से जानते हैं 'साला' एक गाली है। इसीलिए हो सकता है वह अपने को वाड्रा का साला मानने

में  हीनता  अनुभव करते हों।

बहरसूरत सब जानते हैं कांग्रेस ने अमित शाह को गुजरात में कितना तंग किया था ,कैसे -कैसे आरोप पत्र मढ़े -गढ़े  थे। अमित शाह तो साफ़ बच गए क्योंकि उनके खिलाफ कुछ प्रमाणित न हो सका।

 लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी। 

अमित शाह के पुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने वाले भी अब बैकफुट पे आये दीख रहे हैं ,बचावी भूमिका में आ गए हैं "रेलवे मंत्री को उनका बचाव नहीं करना चाहिए था "कह रहें हैं।

हमारा मानना है ,जांच से जो सामने आये सो आये ,जांच चले खूब चले ,चिंता किसे है ,ये बात ये मंदमति समझ ले तो उचक -उचक बोलने से कमसे कम इस मामले में तो बाज़ आये। वरना इसका तो जो बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा जीजू ज़रूर मारा जाएगा।


आखिर में एक शैर इस मंद मति के नाम (भगवान् इन्हें सुमति प्रदान करे ):

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,

बिलकुल तेरे जैसी हो ,

मेरा चाहे जो भी हो,

 तेरी ऐसी -तैसी हो।  

तुलसीदास मानस में कहते हैं :

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना ,

जहां कुमति तहाँ विपत निदाना  . 

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है। समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है। जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है।

न प्रारेण नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन|  

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो | | (कठोपनिषद ,द्वितीय अध्याय दूसरी वल्ली ,पांचवां श्लोक)

भावसार :इस सृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र चेतन शक्ति है ,जो वनस्पति ,जीव -जंतु ,पशु -पक्षी व सभी मनुष्यों के जीवन का आधार और कारण है। इसी शक्ति से ये सभी जीवन पाते हैं ,वृद्धि करते हैं तथा क्रिया करते हैं।

दूसरा तत्व जड़ है जिसकी सभी क्रियाएं इस चेतन तत्व के कारण ही होतीं हैं। (प्रकृति स्वयं जड़ है ,ब्रह्म की ही एक शक्ति -'माया शक्ति' है जिसका ब्रह्म से संयोग होने पर ही यह प्रकृति बनके प्रकटित होती है। ).

मनुष्य के जीवन का आधार भी यही आत्मतत्व है। प्राण एवं अपान  भी इसी के आश्रय में अपनी क्रिया करते हैं। दूसरा तत्व जड़ है जो हमारा पंचभौतिक शरीर है।

जब यह आत्मतत्व शरीर से अलग हो जाता है तो प्राण भी अपनी क्रिया बंद कर देता है जिससे मनुष्य मर जाता है। लेकिन इस क्रिया में न जड़ (शरीर )मरता है न चेतन  आत्मा। बल्कि दोनों का संबंध विच्छेद हो जाता है। (आत्मा तो अजर -अमर -अविनाशी चेतन तत्व कहा गया है और यह पांच तत्वों का पुतला ऊर्जा का पुंजमात्र विखंडित होकर अपने मूल तत्वों -आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी में विलीन हो जाता है। ऊर्जा का संरक्षण हो जाता है।

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत  है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है  यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है।

समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया  है।

जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है। 

https://www.youtube.com/watch?v=6dNAG38cveI 

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

भाजपा -नीत सरकार के सत्ता में आते ही इंतहापसन्द मुसलमान जो कांग्रेस राज में परितुष्ट रखे जाते थे जिनका हिन्दुस्तान की सम्पत्ति पर पहला हक़ जतलाया दोहराया  जाता था - जिस तरह मुंह खोलकर बोलता रहा है ,वामपंथी कहीं से
एक कन्हैयाँ पकड़ लाये ,उससे पहले रोहित वोमिला के दुखद अंत की वजह बने वह सिलसिला अभी रुका नहीं है।

परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,

हवा में सनसनी घोले हुए हैं।

वर्तमान कांग्रेस -वामपंथ पोषित  जेहादी सोच के लोगों का हिन्दुस्तान पर बढ़ता शिकंजा और पंजे की शै के  मद्दे नज़र हमें उल्लेखित पंक्तियाँ अनायास याद हो आईं गोधरा के फ़ांसीयाफ्ता मुजरिमों को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा  मिली राहत पर -

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे ,जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे।

भावसार : सारी  कुरीतियां मिट जाएँ ,खालसा पंथ जागे -सम्भल जाएँ सनातन धर्मी समाज को तिरछी निगाह से देखने  वाले। यही सन्देश था गुरुगोविंद सिंह का खालसा पंथ की नींव रखते वक्त।औरंगजेबी सोच को फतहनामा था ये पंक्तियाँ।
लेकिन कांग्रेस के इरादे आज़ादी के पहले से ही कुछ और चले आये हैं :

१९२५ में कांग्रेस ने खालसा पंथ को एक अलग  धर्म का दर्ज़ा देकर एक तरह से सनातन धर्म के व्यापक स्वरूप में तोड़ फोड़ की ,मानव कृत विखंडन की शुरुआत  थी ये साजिश थी ।इसी साजिश के तहत जैन -पंथ को सनातन धारा से अलग करवाया इसे भी एक अलग धर्म की मान्यता मिली।

ऐसी  लगातार विखंडन की   एक  परिणति गोधरा कांड भी  थी ,जिसके तहत जेहादियों ने यह सन्देश दिया था -जो अयोध्या और राम का नाम लेगा उसका यही हश्र होगा।

आज इस संदर्भ का जेहन में चले आना आकस्मिक नहीं है ,गुजरात हाई -कोर्ट का वह फैसला है जिसके तहत फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया गया है। क्या कुछ संविधानिक तकाज़े रहें हैं इस मामले में ऊंची कचहरी की इस फेरबदल पर हमें कुछ नहीं कहना है।
अलबत्ता जिस तरह से भारतीय प्रिंट और इलेक्त्रोनी मीडिया ने इस खबर को नज़रअंदाज़ किया है वह भारत धर्मी समाज को ज़रूर खबरदार करता है। चौंकाता है ,आगाह करता है ,पूछता है खुद को मुस्लिम फस्टर्स कहने वाले कट्टर पंथियों द्वारा रचित गोधरा के फांसी पाए मुज़रिमों को कोर्ट की राहत पर वह खामोश क्यों है ?यह वही मीडिया है जो उसी दौर में एक मुसलमान एमपी के आगकी लपटों  में घिर जाने का तप्सरा बरसों बरस सुनाता रहा ,कई महीनों क्या सालों यह ज़नाज़ा निकला।

पूछा जा सकता है -

"भारतीय युवा क्या तब जागेगा जब उसके नाम पर भी तलवार चलायी  जाएगी ,पूछा जाएगा उससे -तुम्हारा नाम 'नन्द लाल क्यों है 'अकबरादुद्दीन क्यों नहीं है।कुंजबिहारी क्यों हैं आज़म खाना क्यों नहीं है ? मुरारी लाल क्यों है मोहम्मद अली क्यों नहीं है ?

खुद को मुस्लिम पहले समझने बूझने मान ने वाले जेहादी सोच के लोग यही सोचते होंगें इस फैसले पर  -हमारा कोई क्या कर लेगा ,अधिक से अधिक आजीवन कारावास ,उससे क्या हमारा खूंटा उखड़ता है ?

"राम का नाम भी लोगे तो ऐसे ही जला दिए जाओगे।"तौबा करो अयोध्या से अब वरना ...हश्र जानते ही हो।  

भारत धर्मी समाज  को काटा जा रहा है ,गोधरा के जेहादियों का यही सन्देश जा रहा है , हम जो कुछ भी करें  ,हम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता इस देश में। कहाँ गए नेहरू के वंशज?जिन्होनें इस अलहदगी की नींव  रखी जिन्ना को सरआंखों पर बिठाया ?सब खामोश ही नहीं संतुष्ट हैं मय अपने  पाले हुए प्रवक्ताओं के।

हमारा इस पोस्ट के मार्फ़त सम्पूर्ण भारत -धर्मी- समाज से आवाहन है इस मामले को ,गुजरात उच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले के खिलाफ वह उच्चतम न्यायालय  जाए।

जाग जवानी भारत की  ,
कह  अलग कहानी भारत की।

संदर्भ -सामिग्री :यह विचार मानने डॉ नन्द लाल मेहता वागीश जी के हैं जो इस देश के न सिर्फ एक प्रखर विचारक हैं ,भारत धर्मी समाज के एक समर्पित सिपाही भी हैं। उनसे हुई फोन -वार्ता ही हैं ये उदगार जिसमें हमारी भूमिका श्रोता की थी।